ये दिल की लगी है
कोई दिल्लगी नहीं है
आखं मिचली की
खल बलि नहीं है
ये सांसों का सरगम है
घावों पर मरहम है
तुम्हारी नज़रों करम
हमारे जीने केलिए भरम
अय! मेरे दोस्त! मेरे हम दम
तुम मेरे लिए बेशुमार दौलात हो!
सूरज़ की पहली किरण से तुम्हारी याद आती है
चदंन की चादंनी बन बहुत सताती है
तुम्हारे स्पर्श से पुलकित हमारा जीवन
पल्लवित कमल सा दिया सुखन।
आवारगी से बीता आधा जीवन
बहुत सुधारा तुम्हारा आगमन
चाहें कोई इसे फनाह कहें या गुनाह कहें
खिला मेरे लिए मुहब्बत का चमन
ये कस्में व रस्मों का लगन
कभी इसे भूलना न मुमकिन
ये अनमोल! दास्तान
सदियों तक गूंजता
गज़ल व अमरगान।
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