Tuesday, December 23, 2008

दास्‍तान


ये दिल की लगी है
कोई दिल्‍लगी नहीं है
आखं मिचली की
खल बलि नहीं है
ये सांसों का सरगम है
घावों पर मरहम है
तुम्‍हारी नज़रों करम
हमारे जीने केलिए भरम
अय! मेरे दोस्‍त! मेरे हम दम
तुम मेरे लिए बेशुमार दौलात हो!
सूरज़ की पहली किरण से तुम्‍हारी याद आती है
चदंन की चादंनी बन बहुत सताती है
तुम्‍हारे स्‍पर्श से पुलकित हमारा जीवन
पल्‍लवित कमल सा दिया सुखन।
आवारगी से बीता आधा जीवन
बहुत सुधारा तुम्‍हारा आगमन
चाहें कोई इसे फनाह कहें या गुनाह कहें
खिला मेरे लिए मुहब्‍बत का चमन
ये कस्‍में व रस्‍मों का लगन
कभी इसे भूलना न मुमकिन
ये अनमोल! दास्‍तान
सदियों तक गूंजता
गज़ल व अमरगान।

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