Thursday, December 24, 2009

कविता

मंजिल

- डॉ. एस. बशीर, चेन्‍नै

उजालों से डरता हूं मैं
फूलों से जलता हूं मैं
काटों पे पलता हूं मैं
अंधेरों से जीना सीखा
गमों से आगे बढ़ता हॅू मैं।
रिश्‍तों से जुदा, अरसा हुआ मुझे
किस्‍तों में कर्ज चुकाना है मुझे
फरेबियों के वास्‍तें फर्ज निभाना है मुझे
मेरे उसूल, मेरे लिए बाधक बन गये
किसी बेरूखी से गिल शिकवा नहीं मुझे
वक्‍त का तकाज़ा, डराता है मुझे
किये वादों पर जीना मरना है मुझे
निभाने केलिए तड़पना है मुझे।
आंखें तो तलाश रही हैं मं‍जिल, लेकिन……..
पैर डग मगाते, आगे बढ़ रहे हैं
दिल मासूम बन, आंसू बहाता रहा दुख-दर्द, रीति-रिवाज़, जलन-बेचैनी
दिन रात सताते हैं मुझे।
जलती ज़मीन, उबलता आसमां
उगता सूरज, डूबता चांद
गर्दिश में सब एक से लगते हैं, मुझे
इस अंधेरी नगरी, सूनी गलियों में
अवारगी जिंदगी, सहमी-सहमी सी लग रही हैं।
जुगनू सा है प्‍यार, मृग तृष्‍णा से हैं यार
अजनबी के इस सफ़र में
नहीं है कोई हमसफ़र
नहीं है कोई रवातिर दार
नहीं हैं किसी से प्‍यार
मंजिल मिले या न मिले
फिर भी चलना है मुझे ! ………………..फिर भी चलना है मुझे!!
बहुत दूर…………… और बहुत दूर……………
मंजिल की ओर।
मंजिल की ओर।।

Wednesday, June 10, 2009

वीराने जिंदगी

वीराने जिंदगी

कोई भूल नहीं सकता
जो दिल की, धड़कन बनने के बाद
कैसे याद नहीं कर सकता
आखों में तस्वीर उतरने के बाद
क्‍यों हमसे विदा हुई
कैसे हमसे बिछुड़ गयी
क्या हमारी खता थी
तकदीर का खेल कैसा था
सब कुछ पलभर में बदल गया
जीवन खंडहर हो गया
हाय! कैसे हम ‍तुम्हें भूल पायेंगे
इस बेड़े को कैसे पार कर जायेंगे
बार बार क्‍यों याद आती हो ?
हमें तड़पाके क्‍यों चली जाती हो ?
तुम्हारे साथ हमारा जीवन
ऐसे बिदा हुआ
जैसे सुनामी ने
जहां की नज़ारों को सूना कर दिया
मंजिल हमारी वीरान हो गई
हर रोज आंसू बहाने की आदत सी पड़ गई
अब दिल को हलका कर, चेन्‍नै बखश ने का
तरीका तो मिल गया
अब कोई नहीं हमारे आँसू पोछनेवाले
आँसुओं की धारा से
सीना हमारा जल गया।
पहले गालों पर खुशी के आँसू रुकते थे तो
शबनम से चमकते थे।
लेकिन अब वो छालों में बदल गये
हमने ‍प्यार को वफा माना था
तुमसे रिश्‍ता जोड़के
लेकिन ‍वक्त ने हमसे बेवफाई की
ऐसा कभी न सोचना था
कोई मिलने आता नहीं अपना
प्यार से बातें करता नहीं अपना
तुम्हा‍रे जाने के बाद ।
हमारे हाल दिल से
किसी को क्‍या वास्‍ता
अब तो रिश्‍ते - नाते तो बने हैं
एक मतलब सा
आंसुओं की गर्दिश
जिंदगी के बाद क्‍या कोई सोचेगा ?
फिर जनम लेने की बात !
जब इस दुनिया में ही खयामत है तो
खुद की आखों से जहन्‍नुम को देखा है तो
आगे की जिंदगी के बारे में सोचेगा ?
काश ! इस दुनिया को कोई भुला नहीं सकता
और भूलकर भी जी नहीं सकता है क्‍या
नहीं ....... नहीं कभी नहीं
हरगिज़ नहीं ।

Saturday, May 23, 2009

poem

IN THE MEMORY OF DEPARTED SOUL

The fragrance of your love
The deeds of your courage
The cheerfulness of your smile
The pleasantness of your dialogues
Shall remain in our heart
In our memory forever
And everywhere, wherever we move we live
We will always cherish your dreams and your aims
Loving memories draw inspiration in our life
We still feel your presence around us
Your personal touch inspiring us in our day-to-day life
Your spirit gives us strength and courage
To fulfill our dreams and to reach the destination

Tuesday, May 12, 2009

जुदाई

जैसे चाँद से चांदनी
सूरज से रोशनी
सागर से लहरें
फूलों से खुशबू
जुदा नहीं होतीं....
वैसे ही, तुम हमसे
कभी ज़ुदा नहीं हो सकती
हमारी यादों से खफ़ा नहीं
हमारी इरादों से जफ़ा नहीं हो सकती,
चाहे वक़्त और तक़दीर ने
हमें जुदा किया
हमारी यादों से वादों से
कोई जुदा नहीं कर सकते।
क्‍योंकि तुम हमारे दिल में बसी हो
हमें जिंदा-दिली से
जीने की प्रेरणा देती हो ।
हम तुम्‍हारी यादों के सहारे
जी रहे हैं।